राइटर मनीष मूंधड़ा आसनसोल

राइटर मनीष मूंधड़ा आसनसोल

सालों-साल जो खून जलाकर, बच्चों को पालते है,

आजकल के बच्चे उनको, बस एक दिन सँभालते।

मदर्स डे और फादर्स डे का, नया चलन यह आया है,

साल में बस एक दिन ही, बच्चों को उनपे प्यार आया है।

पश्चिम से आई एक हवा ने कैसा ये दस्तूर सिखाया है,

महीनों बात न करने वालों ने भी, स्टेटस पर प्यार जताया है 

स्टेटस पर फोटो लगाकर, जग को यह दिखलाते हैं,

मगर हकीकत में वो माता-पिता, एक-एक पल तरस जाते हैं।

साल के तीन सौ पैंसठ दिन जो तन्हाई में कटते हैं,

हैरान हैं वो बूढ़े माता-पिता, जो आज अचानक सजते हैं।

वो तरसते हैं तुम्हारी आवाज़ को, तुम्हारी एक मुस्कान को,

तारीखों का मोहताज मत करो, माता-पिता के सम्मान को।

जो मां-बाप हैं भगवान का रूप, वो आज हुए बेकार हैं,

सिर्फ एक दिन की इस झूठी इज्जत पर तो धिक्कार है।

रोज छुओ तुम पैर मात-पिता के, यही सबसे बड़ी आराधना है,

उनके चरणों की धूल में छिपी, ईश्वर की असली साधना है।

तीरथ जाने की क्या है जरूरत, जब घर में ही भगवान हैं,

जिनकी दुआओं से चलती सांसें, वो ही हमारी जान हैं।

दुनिया की हर दौलत छोटी है, उनके आशीर्वाद के आगे,

किस्मत वाले हैं वो बच्चे, जो मात-पिता की सेवा में जागे।

तस्वीर नहीं तकदीर बदलो, उन्हें हर पल सम्मान दो,

सिर्फ एक दिन का नाटक छोड़ो, जीवन भर का प्यार दो।

उन्हें आपका पैसा नहीं, बस थोड़ा सा समय चाहिए,

उनको देख जरा सा बस, आप हमेशा मुस्कुराइए।

महंगे तोहफों से नहीं भरता, उनके सूनेपन का दामन,

पास बैठकर दो बातें कर लो, महक उठेगा उनका आंगन।

दौड़ रहे हैं सब पैसे के पीछे, भूल गए वो बूढ़ी आँखें,

तरस रही हैं जो सुनने को, अपने बच्चों की मीठी बातें।

कमा लोगे धन-दौलत फिर से, पर बीता वक्त ना आएगा,

मात-पिता का साया एक दिन, चुपके से उठ जाएगा।