प्रत्याशी दानिश अजीज के साथ असदुद्दीन ओवैसी पीर बाबा के मजार पहुंचे
आसनसोल पश्चिम बंगाल की सियासत राजनीतिक इस वक्त अपने सबसे दिलचस्प मोड़ पर है। 2026 विधानसभा चुनाव में सभी राजनीतिक दलों ने अपनी पूरी ताकत लगा दी है। लेकिन इस चुनावी सरगर्मी के बीच सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या बंगाल का 'मुस्लिम वोट बैंक' इस बार करवट बदलेगा? एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी के तीन दिवसीय बंगाल दौरे ने राज्य के सियासी समीकरणों में हलचल पैदा कर दी है। सोमवार ओवैसी रानीगंज स्थित पीर बाबा की मजार पर मत्था टेकने पहुंचे, जहां उन्होंने अपनी पार्टी की जीत के लिए दुआएं मांगी।पश्चिम बंगाल की सत्ता की चाबी कही जाने वाली मुस्लिम आबादी पर इस बार 'पतंग' अपनी पैनी नजर गड़ाए हुए है। रानीगंज के पीर बाबा मजार पर असदुद्दीन ओवैसी की मौजूदगी महज एक धार्मिक जियारत नहीं, बल्कि एक बड़ा सियासी संदेश है। ओवैसी का यह तीन दिनों का दौरा बंगाल के उन इलाकों पर केंद्रित है, जहां मुस्लिम मतदाता निर्णायक भूमिका में हैं।
सवाल अब यह उठ रहा है कि जो मुस्लिम तबका अब तक 'दीदी' यानी ममता बनर्जी का अभेद्य किला रहा है, क्या ओवैसी उसमें सेंध लगा पाएंगे? क्या टीएमसी के इस मजबूत वोट बैंक में 'पतंग' अपनी उड़ान भर पाएगी? रानीगंज के पीर बाबा मजार पर दुआ और जनसंपर्क के जरिए ओवैसी सीधे जमीन से जुड़ने की कोशिश कर रहे हैं।ओवैसी का बंगाल में सक्रिय होना सीधे तौर पर टीएमसी के वोट बैंक के लिए खतरा माना जा रहा है। अगर मुस्लिम वोटों का ध्रुवीकरण होता है, तो इसका सीधा असर ममता बनर्जी की सीटों पर पड़ सकता है। क्या बंगाल का मुसलमान अपनी 'दीदी' का साथ छोड़कर ओवैसी की 'पतंग' थामेगा? या ओवैसी केवल 'वोट कटवा' की भूमिका तक सीमित रह जाएंगे? हालांकि, ओवैसी के इस दौरे से तृणमूल कांग्रेस को कितना नुकसान होगा, यह कहना अभी जल्दबाजी होगी। बंगाल की फिजा बदली है या नहीं, और क्या मुस्लिम मतदाता ओवैसी के हक में लामबंद होंगे, इसका फैसला तो 4 मई को चुनावी नतीजों के साथ ही साफ होगा।
Mr Ajay Kumar